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Meri bhavnavon ko mile pankh

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बस दो सूखी रोटी खातिर

Posted On: 23 Nov, 2013 कविता में

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पसीने से तरबतर
कड़ी धूप में तपकर
दो सूखी रोटी खातिर
अपने से कई गुना ज्यादा
बोझ ढ़ो रहे मजदूर
हमारे लिये बना रहे रास्ते
हमें न लगे रास्तों में ठोकरें इस वास्तेे
पर उनकी पूरी जिन्दगी
हैं उबड़-खाबड़ रास्तों से भरी
हर पग पर ठोकर है
हर पल संघर्ष है
हर दिन एक नई चुनौती
दो सूखी रोटी खातिर
जाड़ों की सर्दीली रातें
या गर्मी की जेठ दुपहरी
या हो मूसलाधार बारिशंे
सर पर बोझ, कदमों में लड़खड़ाहट
मन में दबी तमाम ख्वाहिशें
हर समय अनहोनी की आहट
बस दो सूखी रोटी खातिर।

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Santosh Kumar के द्वारा
November 23, 2013

आदरणीय नूपुर बहन ,..सादर अभिवादन बहुत अच्छी भावाभिव्यक्ति !…..सादर शुभकामनाएं

    Noopur के द्वारा
    November 25, 2013

    बहुत -बहुत शुक्रिया संतोष जी।

Imam Hussain Quadri के द्वारा
November 23, 2013

बहुत अच्छा मगर अफ़सोस यही है के हमें दर्द नहीं है ये वही जाने जिस पर गुज़रता है यही दर्द महसूस करना ज़रूरी है

    Noopur के द्वारा
    November 25, 2013

    भाई जी आजकल इंसान में संवेदनायें ही मर गईं है। लोगों को मासूम छोटी, प्यारी बच्ची के प्रति ही संवेदना नहीं है तो एक मजदूर के दर्द को समझना तो दूर की बात है। आजकल तो बच्चों को अपने मां-बाप की तकलीफ ही नहीं दिखाई देती तो एक मजदूर की तकलीफ क्या दिखाई देगी।


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