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Meri bhavnavon ko mile pankh

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मानवता का दर्द

Posted On: 19 Nov, 2013 social issues,कविता में

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यह कैसा लोभ!
हर तरफ विक्षोभ ही विक्षोभ।।
लालच के अंधे छीन रहे हमारा सुख चैन।
जनता भूख व बदहाली से मारी फिरती है दिन रैन।।
चारों तरफ फैला एक अजीब सा सन्नाटा।
भ्रष्टाचार का काला धुंआ हर तरफ छाता जाता।।
जिधर देखो, हो रहा मानवता का खून है।
कहीं दूर अधेंरों में दुबक गया सुकून है।।
मासूम चेहरों पर है गंभीरता की लकीर।
बन गये अमीर मन से फकीर।।
हमारे नेता सत्ता का सुख भोग रहे।
जनता के आंसू मिट्टी में दफन हो रहे।।
हर तरफ साम्प्रदायिकता की अग्नि धधक रही।
उसमें गरमा गरम राजनीति की रोटियां है सिंक रहीं।।
आदमी ही आदमी को रहे रोंद।
नेताओं की बढ रही आमदनी वाली तोंद।।
मानवता का दर्द बढ़ता ही जा रहा।
कैसे बचेगी वह यह दुख सबको सता रहा।।

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

dineshaastik के द्वारा
November 20, 2013

अति सुन्दर।  आम आदमी की पीड़ा मुखर।  

Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
November 19, 2013

अहो


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